Sunday, 26 November 2017

पहली तनख्वाह ..

लगा  मानो रुसवाईयाँ भी रुसवाह मिली
आज हाथ में जब पहली तनख्वाह मिली..
मन झूमा, हर्षाया.. कुछ मैंने था कमाया..
वो चंद नोट थाम, मैं फूला ना समाया.. 

चाहे कितना छुपाता, इक मुस्कान आ ही जाती ..
अब देखो लूँगा क्या क्या , सबको वो बताती..
घर पहुँच सबसे पहले, खोला फ़ोन में बाज़ार
नया फ़ोन , कपड़े, जूते, कितना कुछ लेना था यार!

पर फिर अचानक से, माँ की याद आई..
कभी मैंने उसे, एक साड़ी ना दिलाई..
पिताजी ने कब से नई शर्ट ना ली..
बड़े भाई की भी कलाई है खाली..
भाभी ने भी तो कभी कुछ ना माँगा ..
और बीवी जिसने सदा मुझको बाँधा ..
बच्चों को भी तो खिलौने दिला दूं..
बहनों को भी तो कुछ कपड़े मैं ला दूँ..

बस फिर क्या था, मैं जुट गया काम पर..
मन ही मन खुश होता, हर एक के ईनाम पर..

देखते ही देखते, मैंने अपनी झोली भर ली,
खुशियां खरीद के , पहली तनख्वाह खर्च कर ली आयुष :) 

Friday, 28 July 2017

खेल ..

मत छोड़ना ये ज़िंदगी ,
ये है आखिरी रेल,
जीतना नहीं चाहे,
पर तू दिल से खेल.
माना दुनिया तेरे पास ,
यही तुझसे चाहती .
जीत ही बस वो दवा
जो वो तुझसे मांगती .
तो खेल जी भर कर के इतना .
की हार तुझसे हार जाये .
खेलता जा इतना दिल से,
जीत तेरे गीत गाये.
गर जो ऐसा नहीं होता ,
न करना मन मटमैल .
जीतना नहीं भले ,
पर तू दिल से खेल .

Wednesday, 7 June 2017

कहानियां ..

बहुत हैं कहानियां  लोगो को बताने ,
चले बस तो मैं सारी गा कर सुनाऊँ,
मिले तो मुझे  कोई क़दरदान ज़रा
मुस्कान का मुखौटा उतार कर दिखाऊं।

गीत भी संगीत भी सब साथ है यहाँ ,
मीत भी मिले तो वो बातें सुनाऊँ ,
जो बिन बोले मेरे हाल ये समझ ले,
उसे मैं बिठा के , हाल - ए - दिल सुनाऊँ .....

कि किस्सों में मेरे  ज़रा पागलपन है,
सुनाते सुनाते मैं मन मन मुस्काऊँ .....
मिले तो कोई ज़रा पागल सा मुझको ,
बिना माथा पीटे जिसे मैं समझा पाऊं ...

ये बारिश ये मौसम तो हैं बस बहाने,
मैं तो धूप  में भी  ये किस्सा सुनाऊँ ,
मिले तो मुझे  कोई क़दरदान ज़रा
मुस्कान का मुखौटा उतार कर दिखाऊं।

- आयुष :')


Thursday, 11 May 2017

बिजली गुल

इक शाम को  बड़ी  अजब सी बात  हुई
बिजली गुल हो गई , जो थोड़ी बरसात हुई
बैटरी ख़त्म जब हो गई अपने स्मार्ट यार की ,
इन्तहा ही हो गई जब इंतज़ार की 

तब देखा अपनी खिड़की से अजीब वाक़या
लोग आपस में भी करने लगे बातें यहाँ 

कोई मंदिर के किनारे खेलते अंताक्षरी
चल पड़े किस्से कहानी और शेर - ओ - शायरी

निकल आये कई अनोखे खेल वो पुराने
ऑफलाइन लगे लोग जीतने जिताने 

आज तो मानो की जैसे समय पीछे आ गया
मशीनों को छोड़ इंसान घर के नीचे  आ गया 

अब तो मैं ये सोचता हूँ , क्या खूब वो करामात हो
लोग फिर इंसान हो जाएं जो रोज़ ऐसी बरसात हो  ;)
-आयुष  :)  Ayush Jain


Tuesday, 14 February 2017

राह

राह
अपने ही सपनों में सो सा गया हूँ
इस भीड़ में कहीं मैं खो सा गया हूँ.
बिखरना ही है ये, या फ़िर मैं शायद ,
किसी और धागे पिरौ सा गया हूँ.
घर से मैं तकदीर ले के चला था,
और मंज़िल की तस्वीर ले के चला था.
मैं अपनी गति से चले जा रहा था..
जज़्बा जुनूँ संग ले जा रहा था..
फ़िर रास्ते में चौराहा आया
मेरे रास्ते में नया मोड़ लाया..
चुनी राह जो वो यहाँ तक ले आई,
यही राह मुझे अब लगे है पराई..
यहाँ आके अब गुम हो सा गया हूँ
अपने ही सपनों में सो सा गया हूँ..
आयुष

Tuesday, 20 December 2016

वो दौर.....

दुनिया की खुशियों के लिये ,खुद से गद्दारी कर बैठे.
इक दौर भी होता था
हम खुद को हन्साया करते थे.
सब बिन सोचे समझे करते ,और मज़े उठाया करते थे.
अंज़ाम बुरा हो या अच्छा
हम तो इठलाया करते थे.

हार जीत का ज्ञान ना था,
बस खेले जाया करते थे.
जीता कौन है पता नहीं
हम नाचा गाया करते थे.

तब भी ऐसे ही थे,
खुद को ही रुलाया करते थे.
फ़िर पता था कोई नहीं आना , तब खुद को मनाया करते थे.
खुद से माफ़ी मांगते थे
और चुप करवाया करते थे.
फ़िर चुप होकर के  फ़िर से
हम
खुद के संग गाया करते थे.

जब अकेले होते थे, दुनिया की कोई फ़िक्र ना थी.
ईमान था खुद के लिये और हम बस मुस्काया करते थे. :)
आयुष :)

Tuesday, 16 August 2016

शहीद 🚩

#शहीद

लाड़ला वो सबका ,
था सब से छोटा ,
वर्दी में गया था,
तिरंगे में लौटा .

पर उसकी भौंह पर ,
फक्र ज्यों का त्यों है .
बस एक दुख है
ये आंखें बंद क्यों हैं ?

क्या बचपन के जैसे
मज़ाक कर रहा है ये ,
धड़कते धड़कते दिल
सवाल कर रहा है ये .

लो बता ही दिया उसके
साथियों ने मुझको .
रोक सा दिया इन धड़कती
धड़कनों को.

आन्सू तो आए, पर रोना ना आया ,
लगा जैसे बहुत कुछ अभी मैने पाया .
मेरे दुख और सुख में समर* हो गया ,
मेरा बेटा मर के अमर हो गया .

देश को दिया है कुछ , मैं गर्व में रहूंगा .
मैं सारी दुनिया से अभिमान से कहूंगा ..

वो था प्यारी लोरी ,
राष्ट्र गीत हो गया .
मेरा इकलौता बेटा
शहीद हो गया .

आयुष :)
*समर - युद्ध, सन्ग्राम